बच्चोंं के व्यक्तित्व विकास में होती है पिता की अहम भूमिका…

संतान को जन्म देने के लिए मात -पिता दोनों की ही समान भूमिका होती हैं लेकिन जहां तक बच्चोंं की देख भाल की जिम्मेदारी की बात है तो इस पुरुष प्रधान समाज ने इसकी सारी जिम्मेदारी महिलाओं पर डालकर अपने  कर्तव्य  से अलग रहने का भरपूर प्रयास किया है .जब बच्चोंं के जन्म के लिए दोनोंं जिम्मेदार हैं ,तो बच्चोंं के लालन पालन की सारी अकेली मां पर ही क़्योंं थोपी जाती है .

आदमी यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नही हो सकता कि उसका काम केवल काम-धंधा या नौकरी करना है. काम -धंधा या नौकरी करने से उसकी जिम्मेदारी कम नही हो जाती .जब एक कामकाजी माहिला अपना घर -बच्चेंं और दफ्तर दोनों मोर्चे संभाल सकती है तो एक आदमी ऐसा क्यू नही कर सकता ? स्त्री को दफ्तर जाने से पहले और आने के बाद अपने बच्चोंं की देखभाल और उसकी जरूरतों का ध्यान रखना पड़ता है ,जबकि पिता शिशु के पालन मे मां का कोई हाथ नही बंटते .

                                प्रतीकात्मक चित्र
बच्चे ने गंदे कपड़े कर दिए तो स्त्री को ही सुननी पड़ती है . आदमी अपने गीले कपड़े बदलने को तो तैयार रहता है लेकिन एक शिशु के गीले कपड़ों से उसे कोई मतलब नही ,मां आएगी तभी बच्चे के गीले कपड़े उतरेंगे .बिस्तर खराब कर देने पर वे पत्नी को ही पुकारेंगे तब तक बच्चा गंदगी में ही पड़ा रहेगा .पत्नी अपने हाथ का जरुरी काम छोड़कर बच्चे को साफ करने आएगी .यदि पिता ही साफ कर दे तो क्या उसे पाप लग जाएगा .
आधुनिक युग में हम देखते हैंं कि पिता अपने बच्चोंं की पढ़ाई लिखाई के प्रति ना तो जागरुक है ना ही कोई मतलब रखते हैं.
उनकी सोच है कि उन्होंने  अपने बच्चोंं को कॉन्वेंट स्कूल में भर्ती कर दिया है और कोचिंग लगा दी अब उनका कर्तव्य पूरा हुआ .और बाकी की सभी जिम्मेदारी मां पर डाल देते हैं.यहां तक कि कभी बच्चोंं के स्कूल जाकर शिक्षकों से मिलने और बच्चोंं की पढ़ाई का जायजा तक नही लेते।यह जिम्मेदारी भी मां ही निभाए .वही बच्चोंं का होमवर्क भी कराए और स्कूल जाकर शिक्षकों से भी मिले .

                              प्रतीकात्मक चित्र

परिवार ही बच्चोंं का प्रारम्भिक पाठशाला होती है,जहां बच्चा बहुत कुछ सीखता है. माता-पिता के व्यक्तित्व की गहरी छाप शिशु के मस्तिष्क पर पड़ती है अत: पिता को चाहिए कि वह अपनी छाप बच्चोंं पर छोड़ें .

यदि घर का वातावरण अच्छा होगा,तो बच्चोंं का सही विकास होगा ,अत: पिता को कोई ऐसा कार्य नही करना चाहिए ,जिससे बच्चोंं में कुसंस्कार पड़े .अक्सर होता यही है कि पिता अपने बच्चोंं के सामने शराब ,सिगरेट पीते हैंं या पत्नी से मारपीट करते हैं या फिर गंदी गालियां देते हैंं ऐसा करके आदमी ना जाने अपना किया मतलब हल करना चाहता है .बच्चोंं पर अपना रौब साबित करने का यह तरीका उनको पथभृष्ट बना सकता और बच्चोंं की नजर में पिता की छवि धूमिल हो सकती है .अनुशासन बनाए रखने के लिए अनावशयक मारपीट नही की जानी चाहिए.अत्यधिक मारपीट भी उनको ढीठ(जिद्दी) बना देती है .
इसी प्रकार पिता का अनावशयक प्यार भी बच्चोंं को बिगाड़ सकता है .बच्चोंं को पिता का भरपूर प्यार मिलना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहींं कि आप उनको सर पर बिठा लें .
बच्चोंं के अच्छे – बूरे कामो के प्रति निगरानी रखना केवल मां का ही नही,पिता का भी फर्ज है

हर समझदार पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चोंं के प्रति लापरवाही ना बरतें व उन्हें योग्य नागरिक बनाने हेतु उनकी उचित परवरिश करें .

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