सूर्य ग्रहण , ज्योतिष और विज्ञान के अनुसार .

सूर्य ग्रहण – जब चन्द्रमा ,पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरता है ,तथा पृथ्वी से देखने पर सूर्य को पूर्ण या आंशिक रूप से ढक देता है तब इसको सूर्य ग्रहण बोला जाता है .

पृथ्वी ,सूर्य की परिक्रमा करती है और चन्द्रमा ,पृथ्वी की .कभी – कभी चन्द्रमा ,सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है .जिस कारण सूर्य की कुछ या पूर्ण रोशनी को पृथ्वी तक आने से रोक देता है जिससे पृथ्वी पर अंधकार फैल जाता है इस घटना को सूर्य ग्रहण कहते हैं . यह घटना हमेशा अमावस्या को ही होती है ,सूर्य ग्रहण कुछ सेकंड से लेकर 11 मिनट तक का हो सकता है.

सूर्य ग्रहण के प्रकार –

(पूर्ण सूर्य ग्रहण ) –

पूर्ण सूर्य ग्रहण उस समय होता है जब चन्द्रमा ,पृथ्वी के काफी नजदीक रहते हूए ,पृथ्वी तथा सूर्य के बीच में आ जाता है और चन्द्रमा पूरी तरह से सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक नही पहुंचने देता जिस कारण पृथ्वी पर अंधकार छा जाता है तथा पृथ्वी से सूर्य दिखाई नही देता ,इस प्रकार की घटना को पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं .

(आंशिक सूर्य ग्रहण ) –

आंशिक सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा इस प्रकार से पृथ्वी और सूर्य के बीच का कुछ भाग आ जाता है तथा पृथ्वी से सूर्य का कुछ ही भाग दिखाई नही देता तब इसको आंशिक सूर्य ग्रहण कहते हैं.

( वलयाकार सूर्य ग्रहण )-

वलयाकार सूर्य ग्रहण में जब चन्द्रमा ,पृथ्वी से काभी दूर रहते हूए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तथा चन्द्रमा ,सूर्य को इस प्रकार ढ़कता है ,कि सूर्य का केवल मध्य भाग ही छाया क्षेत्र में आता हैं तथा कंगन आकार में बने सूर्य ग्रहण को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं.

सूर्य ग्रहण ऋषि मुनियों के अनुसार –

ऋषि मुनियों ने सूर्य ग्रहण के समय भोजन के लिए मना किया है उनके अनुसार जब चन्द्रमा ,सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तो कीटाणु तेजी और बहुलता के साथ वतावरण में फैल जाते है जिससे वह खाने पीने की खुली वस्तुओं को दूषित कर देते हैं .सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि ,नेत्र ,पित्त की शक्ति कमजोर पड़ जाती है .गर्भवती महिलाओं को सूर्य ग्रहण नही देखना चाहिए, क्योंकि सूर्य ग्रहण के प्रभाव में आकर शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है तथा गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है इसलिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा देना चाहिए.
ग्रहण लगने के पूर्व नदी या घर में उपलब्ध जल से स्नान करके भगवान का भजन , यज्ञ ,जप करना चाहिए.

 आध्यात्मिक दृष्टिकोण –

यह तो स्पष्ट है कि सूर्य में अद्भुत शक्तियां निहित है और ग्रहण काल में सूर्य अपनी पूर्ण क्षमता से इन शक्तियों को इन रश्मियों को विकीण करता है .जिसे ध्यान मनन के प्रयोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है ,किन्तु इतना ही जितना हमारे शरीर में क्षमता है , ग्रहण का शाब्दिक अर्थ ही लेना है ,अपने भीतर के अंधकार को मिटाने के लिए दैनिक ,आराधना ,पूजा ,अर्चना इत्यादि विशेष पर्वो पर करते रहने का विधान है .

भौतिक विज्ञान की दृष्टि से –

ग्रहण का कोई अध्यात्मिक महत्व हो अथवा ना हो लेकिन दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए यह अवसर किसी उत्सव से कम नही होता है .बडे- बडे शोधकर्ता एव खगोलविद इसके इंतजार बहुत ही वेसब्री से करते हैं क्योंकि ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्रह्मांड में अनेकोंं विलक्षण एंव अद्भुत घटनाएं घटित होती है जिससे कि वैज्ञानिकों को नये- नये तत्थों पर कार्य करने का अवसर मिलता है . 1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक ने सूर्य ग्रहण के अवसर पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल में हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था .

सूतक –

ग्रहण में सूतक का विशेष महत्व है,हिंदू धर्म में सूतक लगने पर कोई भी नया कार्य नही करना चाहिए, ऐसा करना अशुभ माना जाता है .

क्या ना करें .

(1) ग्रहण के समय कोई भी नया कार्य ना करे .
(2) सूतक के समय खाना ,खाना और बनना दोनो मना है.
(3) देवी देवताओं की मूर्ति और तुलसी के पौधे को हाथ नही लगाना चाहिए.

क्या करें –

(1) मंत्रो का उच्चारण करें .
(2) ग्रहण के समय में भगवान का ध्यान और भजन करना चाहिए.
(3) ग्रहण समाप्ति के बाद घर पर गंगाजल का छिड़काव करें.

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