देवदासी प्रथा ..शोषण का ही एक रुप .

धर्म के नाम पर औरतों के शोषण का सिलसिला हजारों वर्षों से चला आ रहा है .कुछ प्रथाओं को लेकर जनमानस के मन में ऐसा मतिभृत उत्पन्न कर दिया गया है कि , विधर्मियों के सवाल पर पर वे जानकारी ना होने पर चुप्पी साध जाते है .और ऐसी ही एक प्रथा है देवदासी प्रथा.

देवदासी प्रथा की शुरुआत –

भारत में सबसे पहले देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के शोषण को संस्थागत रुप दिया गया था . इतिहास और मानव विज्ञान के अध्येताओं के अनुसार देवदासी प्रथा संभवत: छठी सदी में शुरु हुई थी .ऐसा माना जाता है कि अधिकांश पुराण भी इसी काल मे लिखे गए थे .

देवदासी प्रथा का मतलब और इनके काम –

देवदासी प्रथा के अंतर्गत विशेषकर पिछड़े वर्गों ( शूद्रों ) में पुत्र प्रप्ति की मन्नत पूरी होने के बाद एक कन्या को मंदिर में दान देना होता था जो रजस्वला होने तक मंदिरों की देख -रेख , सफाई ,पूजा -पाठ की समग्री ,संयोजन , मंदिरों में नृत्य आदि कार्य संभालती थी .
रजस्वला होने पर मंदिर के देवता को ब्याह दी जाती थी  जो (Servant of God ) यानी देवता की दासी कहलाती थी . देवता से ब्याही इस महिलाओं को ही देवदासी कहा जाता है. उन्हें जीवन भर इसी तरह रहना पड़ता था .
मंदिर के देवता से शादी के बाद इस विश्वास के साथ कि पुरुषों में देवता का अंश होता है , मंदिर के प्रमुख पुजारी , व्यवस्थापक मंडल के अधिकारियों के अलावा प्रभवशाली सामंत एंव कुलीन अभ्यागत संभोग क्रिया करते थे.
कालिदास के ”  मेघदूतम ” में मंदिरों में नृत्य करने वाली आजीवन कुंंवारी कन्याओं का  वर्णन है , जो संभवत: देवदासियां ही रही होंगी .
” मत्स्य पुराण,  विष्णु पुराण तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी देवदासी का उल्लेख मिलता है . प्रत्येक देवदासी को देवालय में नाचना ,गाना पड़ता था . साथ ही , मंदिरों में आने वाले खास मेहमानों के साथ शयन करना पड़ता था इसके बदले में उन्हें अनाज या धनराशि दी जाती थी .
देवदासी प्रथा का प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रुप से था . इसके पीछे तर्क दिए जाते थे कि मंदिर में देवदासी के साथ प्रणय -क्रीड़ा करने से गांव पर कोई विपत्ति नहीं आती है और सुख शांति बनी रहती है .
तीसरी शताब्दी में प्रारम्भ में इस प्रथा का मूल उद्देश्य धार्मिक था .चोल तथा पल्लव राजाओं के समय देवदासियां  संगीत , नृत्य तथा धर्म की रक्षा करती थी . 11वीं  शताब्दी में तंजोर में राजेश्वर मंदिर में 400 देवदासियां थी , सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां थी .1930 तक तिरुपति ,नाजागुण में देवदासी प्रथा थी .
देवदासियों की 2 श्रेणियांं होती हैं पहली रंगभोग और दूसरी अंग भोग . दूसरी श्रेणी की देवदासियों को मंदिर से बाहर जाने की अनुमति नहीं है. चेल्लमा देवी को समर्पित करने की रस्म शादी की तरह ही थी  . कन्या की उम्र 5-10 वर्ष की होती है उस समय कन्या का नग्न जुलूस मंदिर तक लाया जाता था . उसको फिर देवदासी के रूप में दीक्षिव किया जाता है . समर्पण के बाद वे देवदासियां मंदिर और पुजारियों की सम्पति हो जाती है .इसके बाद वे किसी जीवित इंसान से शादी नहीं कर सकती थी . पहले देवदासियों को मंदिर में पूजा -पाठ और उसकी देखभाल के लिए होती थी  वे नाचने गाने जैसी 64 कलाएं सीखती थी लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ उसे उपभोग की वस्तु बना दिया गया .

21वीं सदी के भारत में देवदासी प्रथा का हाल कैसा है .

दक्षिण भारतीय मंदिरों में किसी न किसी रुप में आज भी दासियां हैं . स्वतंत्रता के बाद लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी -देवताओं को समर्पित की गई थी .चरम पर पहुंची आधुनिकता में भी यह कुप्रथा कई रुपो में जारी है . कर्नाटक सरकार ने 1982 और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था ,लेकिन मंदिरों में देवदासियों का गुजारा बहुत पहले से ही मुश्किल हो गया था 1990 में किये गए सर्वेक्षण के अनुसार 45.9 फीसदी देव दासियां महानगरों में वेश्या वृति में संलिप्त मिली ,बाकी ग्रमीण क्षेत्रों में खेतिहार मजदूरी और दिहाड़ी पर काम करती पाई गई.

भारत सरकार के कानून के अनुसार –

देवदासी प्रथा का प्रचलन बंद हो चुका है. कर्नाटक सरकार ने 1982 और आंध्र प्रदेश सरकार ने1988 में इस प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया था , लेकिन अभी भी कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना ,तमिलनाडु ,ओडिसा ,और गोवा के कुछ इलाकों में देवदासी प्रथा के मामले उजागर होते रहते हैं .
इस प्रथा को निभाने वाले लोगों को या तो कानून के बारे में पता नहीं होता या फिर वे जानते हुए इसकी परवाह नहीं करते . क्योंंकि देवदासी प्रथा में शामिल लोग और इसकी खातिर सजा पाने वाले लोगों के आंकड़े में बहुत फर्क है . आजादी के पहले और बाद में भी सरकार ने देवदासी प्रथा पर पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाए . एक आंकडे के मुताबिक सिर्फ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में देवदासी है .
ऐसे लोगों पर कानून का असर इसलिए भी नही होता क्योंंकि कानून इस प्रथा को सिर्फ अपराध मानता है जबकि पीडि़त लोग काफी पिछड़े समाज से होते हैं और उन्हें शिक्षा , स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरुरते भी नहीं मिल पाती .

देवदासी प्रथा के कुछ प्रमुख कारण –

  • कर्नाटक सरकार ने देवदासी प्रथा अधिनियम 1982 के 37 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस कानून के संचालन हेतु नियमों को जारी करना बाकी है जो कही ना कही इस कुप्रथा को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध हो रहा है .
  • देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए सेवक के रूप में युवा लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करने की यह  कुप्रथा न केवल कर्नाटक में बनी हुई है , बल्कि पड़ोसी राज्य गोवा में भी फैलती जख रही है .
  • अध्यन के अनुसार , मानसिक या शारीरिक रूप से कमजोर लड़कियां इस कुप्रथा के लिए सबसे आसान शिकार है . नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सटी के अध्यन की हिस्सा रहीं पांच देवदासियों में से एक ऐसी ही किसी कमजोरी से पीडि़त पाई गई .
  • NLSIU के शोधकर्तओं ने पाया कि सामाजिक आर्थिक रूप से हाशिये पर स्थित समुदायों की लड़किया इस कुप्रथा की शिकार बनती रही हैं जिसके बाद उन्हें देह व्यापार के दल -दल में झोंंक दिया जाता है .
  • TISS के शोधकर्ताओंं ने इस बात पर जोर दिया कि देवदासी प्रथा को परिवार और उनके समुदाय से प्रथागत मंजूरी मिलती है 

देवदासी प्रथा खत्म ना होने के प्रमुख कारण –

  • व्यापक स्तर पर इस कुप्रथा के अपनाए जाने और यौन हिंसा से जुड़े होने के संवंधी तमाम साक्ष्योंं के बावजूद हालिया कानूनों जैसे कि यौन अपराधों से बच्चोंं का संरक्षण अधिनियम , POCSO अधिनियम , 2012 और किशोर 414 (JJ) अधिनियम ,2015 में बच्चोंं के यौन शोषण के रुप में इस  कुप्रथा का कोई सदर्भ नही दियि गया है .
  • भारत के अनैतिक तस्करी रोकथाम कानून या व्यक्तियोंं की तस्करी (रोकथाम , संरक्षण और पुनर्वास ) विधेयट , 2018 में भी देवदासियों को यौन उद्देश्यों हेतु तस्करी के शिकार के रुप में  चिन्हित नही किया गया है .
  • अध्ययन ने यह रेखांकित किया है कि समाज के कमजोर वर्गों के लिए आजीविका स्रोतों को बढ़ाने में राज्य की विफलता भी इस प्रथा की निरंतरता को बढ़ावा दे रहा है .

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