नियोग प्रथा ; प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक .

वंश परम्परा चलाने के लिए कुछ शर्तों के साथ नियोग प्रथा पुरातन काल में प्रचलित थी . धृतराष्ट्र और पाण्डु दोनों का जन्म  महर्षि वेदव्यास के द्वारा नियोग प्रथा से ही हुआ था . कर्ण, कुन्ती के विवाह से पूर्व संतान थी , परन्तु युधिष्ठिर का जन्म धर्म राज से , भीम का जन्म पवन देव से , अर्जुन का जन्म इंद्रा देवता से तथा माद्री के दोनों पुत्रों नकुल और सहदेव का जन्म देवताओं के वैध धन्वंतरी से नियोग प्रथा के  द्वारा ही हुआ था .

 प्रतीकात्मक चित्र

वेदादि शस्त्रों के अनुसार –

शास्त्रों के अनुसार नियोग प्रथा ,पति द्वारा संतान उत्पन्न ना होने पर या पति की अकाल मृत्यु की अवस्था में ऐसा नियमवद्ध उपाय है .जिसके अनुसार स्त्री अपने देवर , जेठ ,ससुर ,ताऊ,चाचा ,मामा,इन सबके संग नियोग प्रथा से गर्भाधान करा सकती है . यदि पति जीवित है तो वह व्यक्ति ,स्त्री के पति कीइच्छा से केवल एक ही और विशेष परिस्थितमें दो संतान उत्पन्न करा सकता है . इसके विपरीत आचरण राजदंड प्रयाश्चित के भागी होते हैं .नियोग प्रथा के नियम अनुसार नियुक्त पुरुष सम्मानित व्यक्ति होना चाहिए. इसी विधि के द्वारा पांडु राजा की स्त्री कुंती और माद्री आदि ने नियोग किया था .

मनुस्मृति के अनुसार –

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु संतान विहीन अवस्था में हो जाती है , तो उस परिस्थति में उस की वंशावली को आगे बढ़ाने के लिए जो व्यवस्था की गई है , वह ” नियोग ” कहलाती है .
नियोग प्रथा के अनुसार किसी शादीशुदा माहिला को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो तो वह किसी ज्ञानी ब्राह्मण पुरुष से नियोग प्रथा के अनुसार उससे संतान सुख की प्राप्ति कर सकती है .
नियोग प्रथा में एक शर्त के अनुसार नियोग करने वाला व्यक्ति उसके पति के घर पर उसके शयनकक्ष में ही इस प्रथा को निभाना होगा और इस प्रथा के अनुसार तीन बच्चे तक पैदा किया जा सकते है .
नियोग के लिए उत्तम जीवन वाले , विद्यावान और निरोग पुरुषों का सहारा लिया जा सकता है , सर्वप्रथम परिवारजनों ,संबंधीजनों , निज जातिवर्गीय तत्पश्चत अनजान व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाती थी . संतान प्राप्ति ना होने पर दस बार प्रयत्न किया जा सकता है . प्राचीन समय में ऋषिमुनि को श्रेष्ठ वर्ग में गिना जाता था .अत: उनसे नियोग द्वारा संतान प्राप्ति होती थी . यह कर्म अच्छा माना जाता था ,बुरा नहीं .

नियोग कब और किसको – 

  • अगर स्त्री का पति धर्म के लिए परदेश गया हो तो स्त्री आठ वर्षों तक उसका इंतजार करे ,अगर विद्या और कृति के लिए गया हो तो छ: वर्षों तक इंतजार करे , अगर धन कमाने गया हो तो तीन वर्षों तक इंतजार करे , अगर पति इस समय सीमा में वापस ना आये तो नियोग प्रथा द्वारा संतान प्राप्ति की जा सकती है .
  • अगर स्त्री को गर्भ ना रुके , संतान की जन्म के साथ ही मृत्यु हो जाती हो , या स्त्री केवल  कन्याओं को जन्म देती है तो नियोग किया जा सकता है .
  • अगर पुरुष संतान उत्तपन्न करने में समर्थ ना हो तो संतान की कामना करने वाली स्त्री ,नियोग द्वारा संतान प्राप्ति कर सकती है .

नियोग के नियम –

  • परिवार , कुटुम्ब की किसी महिला , वृद्ध महिला का उस  स्थान पर रहना अनिवार्य है .
  • संसर्ग से पूर्व महिला एवम पुरुष की देह को सरसों के तेल से नहलाया जाता था ,जिससे देहस्पर्श का सुख न मिले तथा भविष्य में उनके बीच  दया देहाकर्षण ना पनपे .
  • संसर्ग के लिए किसी ज्ञानी महात्मा के द्वारा समय निर्धारण किया जाता है ,जिससे एक ही बार में सफल गर्भधान संभव हो सके एवम भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति की आवश्यकता न हो .

समय के बदलाव के साथ आधुनिक युग में वीर्य बैंक इसी का एक रुप है जिसमें अच्छे कद -काठी वाले शिक्षित , स्वस्थ पुरुषों का वीर्य गर्भाधन के लिए प्रयोग होता है .

  • मेडिकल साइंस द्वारा टेस्ट ट्यूब बेबी प्राप्ति प्रचलन में आ गई है .
  • आधुनिक युग में सेरोगेसी द्वारा संतान की 
  • प्राप्ति होती हैं .

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